राजस्थान की लड़ाई आधे से अढ़ाई…

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अनिल तिवारी

मुंबई.

आठ राज्य, आठ चुनाव और कहानी हर जगह लगभग ‘सेम’ और ‘शेम’ ही। दिल्ली में दोबारा दमन, झारखंड में झटका, महाराष्ट्र में मात और हरियाणा में भी आधी हार…। मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में फुल कटिंग… और उससे पहले पंजाब में पटखनी।

२०१९-२० के आखिरी कुछ महीनों में भारतीय जनता पार्टी की हर जगह भदेस ही हुई। भाजपा ने जीत के लिए कहीं रणनीति बदली तो कहीं मोहरे, पर उसके हिस्से हताशा के अलावा कुछ नहीं आया।

२०१४-१५ में भाजपा ने कई राज्यों में बिना चेहरे के चुनाव लड़ा था, पर सरकारें बनार्इं थीं। जबकि २०१९-२० में उससे उलट रणनीति पर चुनाव लड़ा, नतीजे में सीटें भी गंवाईं और सरकारें भी।

अंततोगत्वा आज भाजपा को सरकारें लूटने की रणनीति पर काम करना पड़ रहा है। उसने पहले मध्यप्रदेश लूटा और अब उसकी ताजा नजर है राजस्थान पर।

२०१९ में लोकसभा के ‘३०० पार’ नतीजों के महज २०० दिनों के भीतर ही सम्पन्न हुए तमाम विधानसभा चुनावों में भाजपा बुरी तरह नकार दी गई थी।

भाजपाई ‘समर्थ’ सत्ता से ‘असमर्थ’ विपक्षी बेंच पर पटक दिए गए थे। क्यों? क्योंकि जनता को लगा कि भाजपा और उसकी सरकारों ने अपनी गलतियों पर ईमानदारी से चिंतन ही नहीं किया है।

उसे दोहराने से बचने की बजाए वो उसी राह पर और मजबूती के साथ आगे बढ़ती रही है। हर जगह केवल बहादुरी की कोरी डींगे हांकी हैं और ‘जनता के मन की बात’ को सिरे से नकार दिया है।

नतीजे में कई राज्यों ने उसकी सत्ता छीन ली। जो जनमत से नहीं मिला उसे अब जबरदस्ती हासिल करने का काम भाजपा ने शुरू कर दिया है।

राजभवन और राज-स्थान का पेंच

राजस्थान में जारी सियासी घमासान और विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल में फंसे पेंच के बीच अशोक गहलोत बहुमत साबित करने को लेकर आश्वस्त हैं।

गहलोत सरकार को १०२ विधायकों का समर्थन हासिल है, यानी विश्वास मत हासिल करने में उसे कोई परेशानी नहीं है।

इस बीच सचिन पायलट समेत कांग्रेस के १९ बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने को लेकर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से जारी नोटिस पर कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया है।

गहलोत बागियों पर कार्रवाई में और देर नहीं चाहते। वे तुरंत सत्र बुलाकर उनकी सदस्यता रद्द करना चाहते हैं, लेकिन राज्यपाल कलराज मिश्र सत्र बुलाने का आदेश देने को राजी नहीं।

क्यों? तो इसका कारण आज की राजनीति बखूबी जानती ही है। जहां जनमत से न मिले, वहां सरकार छीनकर भाजपा अपना अंकगणित ठीक करना चाहती है।

मध्यप्रदेश उसकी झोली में वापस आ चुका है, कल को हो सकता है किसी तिकड़म से राजस्थान भी आ जाए। उसी तरह जिस तरह कभी गोवा और कर्नाटक का खेल हुआ था।

परंतु क्या इससे भाजपा के सत्ता का अंक गणित हरदम के लिए ठीक हो जाएगा?

नहीं! यदि उसे हमेशा के लिए जनमत के आंकड़ों को सुधारना है, तो अपने अंदर झांककर अपनी कमियों का आत्ममंथन करना होगा। अपनी पुरानी चूक सुधारने की नए सिरे से मन:स्थिति तैयार करनी होगी।

अहंकार में तब्दील सियासी समझ से दंभ का आवरण उतारना होगा। जनता से फिर से ‘रि-कनेक्ट’ होना होगा, वर्ना उसका टोटल डिस्कनेक्शन तय है।

नए सियासी माहौल में भी भाजपा पुरानी परिपाटी के आधार पर ही अपनी नीतियां-रणनीतियां तय करती रही और उसने चुनावी सफलता-असफलता पर ईमानदारी से मनन नहीं किया तो नतीजा हर बार उसके लिए चौंकानेवाले ही होंगे। तब शायद उसके पास सरकार चुराने का सामर्थ्य भी न हो।

मुखौटा उतारकर ही देख लेते

२०१४ के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी की छवि विकास पुरुष की बनी थी। हर हाल में विकास के लिए कटिबद्ध, वैज्ञानिक दृष्टिकोण की खूबियों वाली।

जिनकी प्राथमिकता जनहित में सर्वांगीण विकास और उसके लिए आवश्यक पारदर्शी प्रशासन और नीतिगत प्रयोगों से कतराता नहीं था। इसलिए जनता ने केंद्र से लेकर राज्यों तक भाजपा को कमान सौंपी थी।

मोदी सरकार की पहली पारी को छोड़ भी दीजिए, पर जितने भी फैसले ‘सरकार २.०’ ने अब तक लिए हैं, एक भी गरीब-मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन को सुखमय नहीं बनाता।

मोदी यदि अपने वायदों पर ही अमल कर देते तो शायद राज्यों की परिस्थितियां भिन्न होतीं। प्रधानमंत्री एक बार प्रधान प्रचारक का मुखौटा उतारकर ही देख लेते तो सत्य परिस्थिति से वाकिफ हो जाते।

जान जाते कि उनकी नीतियों से न गरीब-मध्यमवर्गीय खुश हैं, न व्यापारी और उद्योगपति। उस पर निवेशक सुधारों के मामले में उनकी पर्याप्त दृढ़ता की कमी के कारण निराश है।

जितनी लीगल और फाइनेंशियल पाबंदियां आज हैं वो सभी मिडिल क्लास के लिए या छोटे-मझोले व्यापारियों के लिए हैं। नई फाइनेंसियल नीति पारदर्शक व्यापार में बाधा बनी है, डिजिटल डीलिंग अड़चनें पैदा कर रही है।

केंद्र नगद में व्यापार करने देना नहीं चाहता और डिजिटल में अगर कोई व्यापार करता है तो उसे उसकी नीतियां करने नहीं देतीं। छोटे-बड़े व्यापारी की हर एक एंट्री पर किसी-न-किसी तरीके से केंद्र की नीतियां अड़चनें खड़ी करती हैं।

यही हाल हर क्षेत्र का है। इसीलिए परेशान मतदाता राज्यों के चुनाव में उसे नकार रहा है। यही समझने का प्रयास केंद्र सरकार को करना था कि जनता क्या चाहती है?

साथ ही उसे इस भ्रम से भी निकलना था कि वो चाहे जो करे, हर किश्त का चुनावी युद्ध वही जीतेगी। ‘जनमत का भूकंप’ और आफ्टरशॉक्स की सुनामी, हर बार उसी के पक्ष में ही होगी।

हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। लिहाजा, आज भाजपा पर दूसरी सरकारों पर डोरे डालने की नौबत आ गई है।

क्या सुध ली?

भाजपा ने सत्ता के अति-विश्वास में जनता का विश्वास खोया है। कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया, अच्छी बात है।

३७० निष्प्रभावी हो गई, और अच्छी बात है। कश्मीरियों की उन्हें फिक्र है। सीएए लेकर आ गए, ठीक है। पाकिस्तानी-बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों की उन्हें सुध है तो देश के गरीब किसानों की क्यों नहीं?

क्या सुध ली कर्ज में दबे कास्तकारों की? आम आदिवासियों की, गरीब मजदूर-कामगार और मध्यम वर्गीय की? यह देश जान नहीं पाया।

देश तो यह भी जान नहीं पाया कि नोटबंदी-जीएसटी से देश को क्या मिला? नोटबंदी के बाद तीन-चौथाई इकोनॉमी ठप हो गई। उस पर जीएसटी ने रही बची कसर पूरी कर दी।

नई कर प्रणाली से पहले अलग-अलग मद में कोई जितना टैक्स भरता था, वो आज उससे चार गुना ज्यादा टैक्स अदा कर रहा है।

हवा को छोड़ दिया जाए तो हर वस्तु और हर अदृश्य सेवा के लिए टैक्स दिया जा रहा है। परंतु फिर भी केंद्र का खजाना नहीं भर रहा। क्यों?

क्योंकि जनता से वसूली गई राशि का उसमें एक तिहाई भी नहीं पहुंच पा रहा। तो कहां जा रहा है दो तिहाई जीएसटी?

क्या इस अनियमितता से काला धन नहीं बन रहा? गरीब रोटी को मोहताज हो गया है और पूरे देश में फिर इंस्पेक्टर राज हो गया है। महंगाई दिन-ब-दिन बढ़ रही है।

जनता जानना चाहती है कि किसी चुनाव के लिए यदि पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर हो सकते हैं तो क्या महंगाई के लिए उसकी दामबंदी नहीं हो सकती? खासकर कोरोना के इस कठिन काल में।
सरकारें लूटने की नौबत न आती।

कुल मिलाकर नई रणनीति में ‘नई भाजपा’ चारों खाने चित रही है। अब सवाल उठता है क्यों? केंद्र में तो अब भी नरेंद्र मोदी का चेहरा ही है, फिर क्यों उसे राज्यों में सफलता नहीं मिल पाई?

देश में मजबूत सरकार वाली भाजपा की राज्यों में यह दुर्गति आखिर क्यों हुई? क्या है इसकी सियासी वजह?

वर्ष २००२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा दी गई ‘राजधर्म’ की सीख का यदि गत ६ वर्षों के दौरान सही मायने में पालन हुआ होता तो आज तस्वीर भिन्न होती।

भाजपा आलाकमान के पास ‘कथनी और करनी’ के फर्क को मिटाने का अवसर था। वे चाहते तो दिखला सकते थे कि जनहित ही उनके राजधर्म के एजेंडे पर हमेशा रहा है और रहेगा।

राजा को प्रजा अपने प्राणों के समान प्यारी होनी चाहिए। अर्थात स्वयं उसे और उसके मंत्रियों को जनता के दुख-सुख का समय-समय पर पता लगाते रहना चाहिए।

क्या इस सीख का खयाल राजनैतिक सूझबूझ वाली केंद्र की सरकार को है? क्या उसने जनता को प्राणों से ज्यादा अहमियत दी है?

यदि दी होती तो एक-एक करके तमाम राज्यों की किस्मत का फैसला उसके विरोध में न होता और आज उस पर सरकारें लूटने की नौबत नहीं आती।

एक वर्ष पहले तक महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ, तो झारखंड में आजसू के साथ भाजपा सत्ता में थी। हरियाणा में उसकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी।

चुनाव बाद उसके हिस्से बची थी तो केवल हरियाणा की आधी सरकार। मध्यप्रदेश के बाद आज राजस्थान की लड़ाई उसी आधे को अढाई तक ले जाने की अनैतिक लड़ाई है। उससे ज्यादा कुछ नहीं।

( साभार : सामना )

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