राहत इंदौरी: इतना खरा बोलने वाला शायर फिर रूबरू होगा?

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उमेश त्रिवेदी

पब्लिक स्टेज पर गीतों का सुरूर और गजलों का गरूर पिघल जाने के बाद कवि सम्मेलनों और मुशायरों में जाना तो बरसों पहले छोड़ दिया था, लेकिन टीवी स्क्रीन और यू-ट्यूब के जरिए इनसे मुलाकात का सिलसिला अभी भी बना रहता है।

हिंदी और उर्दू की दुनिया में कई ऐसी हस्तियां हैं, उनके कलाम हैं, जो ख्वाबों के टूट जाने के कारण नींद उचट जाने के बाद रात में किताबों के पन्नों अथवा ’आई-पैड’ के स्क्रीन पर वक्त काटने का सबब बन जाते हैं। उन नामों में राहत इंदौरी का नाम सबसे अव्वल आता है, जिनकी शायरी के साथ समय आसानी से गुजर जाता है।

कई मर्तबा, जब भी, खुद से अकेले में सच्ची गुफ्तगू करने की जरूरत महसूस होती थी, अपने भीतर कुछ दरयाफ्त करने की तलब लगती थी, तो राहत इंदौरी की शायरी के रूबरू खड़े हो जाते थे। राहत की शायरी एक अजीबोगरीब सुकून देती थी।

मुशायरों में उनका अंदाजे-बयां कुछ ऐसा था कि वो महफिल में मौजूद हर व्यक्ति से सीधे बात करते महसूस होते थे। इसकी एक वजह शायद यह भी है कि उनकी बात हर शख्स के दिल के कोनों में पहले से ही दर्ज होती थी और उनकी जुबां से फूट पड़ती थी।

मौत को तमाशा कहने वाले राहत इंदौरी को अपनी बीमारी की हकीकत बखूबी पता थी और शायद इसीलिए उन्होंने ने उनका इलाज कर रहे सेम्स के फाउण्ड़र चेयरमैन डॉ.विनोद भंडारी से कह दिया था कि ‘डॉक्टर साहब अब मेरा बच पाना मुश्किल है।’

वो दो दिन पहले इंदौर के सेम्स हॉस्पिटल में कोरोना के इलाज के लिए भरती हुए थे। उसके पहले किसी दूसरे अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। केस बिगड़ता देख उन्हें बेहतर इलाज के लिए सेम्स हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया था।

यह महज एक संयोग है कि अस्पताल में उनके दाखिले के वक्त मेरी डॉक्टर विनोद भंडारी से बात चल रही थी। उसी वक्त उन्होंने बताया था कि राहत इंदौरी को सेम्स रिफर किया गया है। राहत कोरोना-पॉजीटिव हैं और गंभीर हैं।

मेरे मुंह से बरबस यही निकला था कि ‘यार, उन्हें ठीक कर देना।’ डॉक्टर भंडारी ने कहा था कि उनसे बहुत पुराने ताल्लुकात हैं। भले इंसान हैं। सेम्स में बड़ी उम्मीदों के साथ आए हैं। उनके भरोसे को कायम रखना है। लेकिन तकदीर को शायद यह मंजूर नहीं था।

राहत इंदौरी उन लोगों मे शुमार किए जा सकते हैं, जो पब्लिक-मीटिंग्स और मुशायरों में हजारों लोगों के बीच सियासत की सख्त नजरों के सामने सच बोलने का माद्दा रखते थे।

उनके नजदीक यह भी गौरतलब है कि वो न केवल पब्लिक के सामने सच बोलने का माद्दा रखते थे, बल्कि खुद से भी सच बोलने, हकीकतों से मुकाबला करने और जूझने की हिम्मत रखते थे।

इतना सच बोलने वाला शायर दुबारा आसानी से मिलने वाला नहीं है। वो हर उम्र के लोगों के पसंदीदा शायर थे। शायरी के हर फन में माहिर राहत इंदौरी को हर उम्र के लोगों के दिलो में खास मुकाम हासिल था।

वो इश्क-मोहब्बत की शायरी के जरिए जहां जवान लोगों के दिलों में जगह बनाते थे, वहीं उनका फलसफाना अंदाज लोगों के जहन को झंझोड़ देता था।

हुस्न-आशिकी से अलग जमीनी मसलों पर उनकी पकड़ शायरी में उनको अलग ऊंचाइयां देती है। राहत ने कोई एक दर्जन किताबें लिखी हैं। कई फिल्मों के गीत लिखे, जो खासे लोकप्रिय हुए।

वो किस किस्म की जिंदगी को पसंद करते थे, उनकी शायरी में उनका यह जज्बा बखूबी बयां होता है – ‘अपनी आंख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो…जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो…। राह के पत्थर से बढ़कर कुछ नहीं है मंजिल…रास्ते आवाज देते हैं, सफर जारी रखो…। एक ही नदी के हैं ये दो किनारे, दोस्तों…दोस्ताना जिंदगी से रखो, मौत से यारी रखो…। ये हवाएं उड़ न जाए ले के कागज का बदन… दोस्तों मुझ पर कोई पत्थर भारी रखो।’

सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने का उनका तरीका सीधी चुनौती देने वाला था- ‘बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर, जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं…।’ राहत इंदौरी के लिए मुल्क और ईमान के क्या मायने हैं वो उनके इस शेर में नजर आते हैं – ऐ जमीन एक रोज तेरी खाक में खो जाएंगे, सो जाएंगे, मर के भी रिश्ता नहीं टूटेगा हिन्दुस्तान से, ईमान से…।

राहत इंदौरी कई मौको पर यूं ही याद आते रहेगें, क्योंकि अब दंगों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला शायर यह कहते हुए शायद ही लोगों से मुखातिब होगा- अभी तो सिर्फ परिंदे शुमार करना हैं, ये फिर बताएंगे कि किसका शिकार करना है..। इतना सच बोलने वाला शायर क्या फिर कभी हमारे रूबरू होगा?

( लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक हैं. )

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