बोधगया मठ की 8 एकड़ जमीन पर RSS ने किया कब्जा

कलेक्टर ने मुख्यमंत्री-कोर्ट तक के आदेश को किया दरकिनार

कब्जा किए गए परिसर में बना आरएसएस का विद्यालय

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रायपुर.

छत्तीसगढ़ में बलरामपुर जिले के डीपाडीह में बोधगया मठ की क़रीब आठ एकड़ की क़ीमती ज़मीन आरएसएस के कार्यकर्ताओं को नियम विरुद्ध तरीक़े से अंतरण करने का है आरोप… रायपुर से मनीष कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

छत्तीसगढ के बलरामपुर जिले के डीपाडीह में बोधगया मठ की करीब आठ एकड़ कीमती जमीन न केवल आरएसएस के कार्यकर्ताओं को नियम विरुद्ध ढंग से ट्रांसफर किया गया बल्कि उस पर स्कूल परिसर का भी निर्माण करा दिया गया. इस मामले में शिकायत के बाद भी अबतक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

इस संबंध में 28 मई 2019 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एक शिकायत पत्र सौंपकर कार्रवाई की मांग की गई थी. यह शिकायत आरटीआइ कार्यकर्ता एएन पांडे ने की थी.

आरटीआई कार्यकर्ता एएन पांडेय ने बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ के ग्राम बेलसर में एक दिवसीय प्रवास पर आये मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से लिखित शिकायत की थी.

जिसमें कहा गया था कि उत्तरी छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले डीपाडीह में स्थित प्रसिद्ध पुरात्विक स्थल पर वर्षों पुराने बोधगया मठ के प्राचीन शिव मंदिर की धर्मदाय की करोड़ों रुपए मूल्य की भूमि पर अवैध कब्जा किया गया है.

इसमें कहा गया कि भूमि राजस्व रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ शासन, संरक्षक जिला कलेक्टर के नाम दर्ज है.  पर, उस बहुमूल्य भूमि को आरएसएस से जुड़े लोगों ने आपस में एक राय होकर साजिश के तहत न्यायिक कार्यवाही करने के नाम पर अवैध रूप से छत्तीसगढ़ शासन का नाम काटकर अपने संस्थान के नाम पर करने का गंभीर अपराधिक कार्य किया है.

मुख्यमंत्री को धर्मदाय की भूमि का विवरण शिकायतकर्ता ने संलग्न दस्तावेज के साथ दिया था. आरटीआइ कार्यकर्ता एएन पांडेय ने अपनी शिकायत में अनावेदक राजस्व विभाग के बालेश्वर राम, अनुभागीय दंडाधिकारी के अलावा महेंद्र यादव, थाना शंकरगढ, जिला बलरामपुर एवं ललितेश्वर श्रीवास्तव, अंबिकापुर, थाना अंबिकापुर का जिक्र किया था.

ललितेश्वर श्रीवास्तव आरएसएस से जुड़े हैं

मुख्यमंत्री बघेल ने शिकायतकर्ता के सामने ही शिकायत लेकर उसकी गंभीरता को समझने के बाद तत्कालीन कलेक्टर को जांच कर कार्यवाही करने निर्देश दिया.

पर अजीब विडंबना है की संघ के कार्यकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ में जब तक बीजेपी की सरकार थी तब तक तो इस कीमती जमीन पर अपना अवैध कब्जा बनाये रखा था पर अब प्रदेश में सरकार जब कांग्रेस की है तब भी आरएसएस कार्यकर्ताओं ने धर्म और आस्था के साथ खिलवाड़ करते हुए इस मठ मंदिर की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन को अब अपनी संस्था के नाम करा लिया.

और इस काम में मदद की तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा ने, जिन्हें मुख्यमंत्री ने जांच कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया था. 2011 बैच के आइएएस संजीव झा फ़िलहाल पिछले महीने से छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में पदस्थ हैं.

मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को अपने हाथों से शिक़ायत देते हुए कहा था जांच व कार्रवाई कर सूचित करें. जब मुख्यमंत्री ने तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा को जाँच करने को कहा पर उन्हें ये आभाष नहीं होगा कि जिन्हें जांच की जिम्मेदारी वे दे रहे हैं वो कीमती जमीन कलेक्टर साहब उन्हीं संघ के कार्यकर्ताओं को ही सौंपने वाले हैं.

हमेशा की तरह जैसा होता आया है. कलेक्टर को मिली इस शिकायत के बाद अनावेदक आरएसएस कार्यकर्ता ( जिनकी लालची नज़र वर्ष 1988 से इस खसरा नंबर 1690ए, 1695ए, 1696ए, 170 बटे 1738 रकबा क्रमश 0.591, 0.235, 1.530, 1.044, 0.178 पर थी ) एकाएक चौकन्ने हो गए और मौके का फ़ायदा उठाते हुए इस कीमती ज़मीन को हड़पने की साज़िश में जाँच करने वाले अधिकारियों से सांठ-गांठ कर सरकार के तमाम नियम क़ानून ताक में रखते हुए ज़मीन को अपने संस्था के नाम कराने में सफल हो गए.

कलेक्टर संजीव झा, जिन पर सारे नियमों को ताक पर रख कर काम करने का आरोप है. इस फ़र्जीवाड़े के बाद आरटीआई एक्टिविस्ट के शिकायतों का दौर शुरू हुआ, पर अंजाम सिफ़र.

शिकायतकर्ता आरटीआई एक्टिविस्ट एएन पांडेय को जब पत्र के माध्यम से इस बात की जानकारी मिली की मठ, धर्मदाय की जमीन शिकायत के बाद भी आरएसएस के लोगों को मिल गई तो उनसे रहा नहीं गया और शुरू हुआ शिकायतों का सिलसिला.

पांडेय ने पत्राचार करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल व प्रदेश के राज्यपाल से लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एडवोकेट जनरल तक को पूरे मामले में संज्ञान लेने आग्रह किया और शासन के नियमों का हवाला देते हुए विस्तार से बताया कि इन आरएसएस कार्यकर्ताओं के द्वारा जमीन को हड़पने की साज़िश पिछले 20 सालों से की जा रही थी.

वर्ष 1991 में भी ऐसी शिकायत के बाद तत्कालीन तहसीलदार ने उक्त प्रकरण में आदेश पारित करते हुए इस जमीन को मंदिर की संपत्ति घोषित किया था तथा शर्त के साथ कहा था कि चंद्रभूषण गिरी मंदिर के तत्कालीन पुजारी के नाम के साथ संरक्षक जिला कलेक्टर सरगुजा, मध्यप्रदेश शासन भी लिखा जाये, जिससे भविष्य में चंद्रभूषण गिरी उक्त भूमि का दुरूपयोग न कर सके.

पर आरएसएस वालों ने वर्ष 1997 में अपने पुजारी को अपने जाल में फांसकर उक्त भूमि का वसीयत मुख्तारनामा लिखा लिया. आरटीआई कार्यकर्ता बताते हैं कि शासन-प्रशासन से गुहार लगाते वे थक गए, तब उन्होंने हाईकोर्ट जाने का मन बनाया और इस पूरे मामले को जिला न्यायालय में व्यवहार वाद एवं अपील के बाद उच्च न्यायालय, बिलासपुर लेकर गए.

अधिवक्ताओं ने कलेक्टर से मिलकर की थी जांच की मांग

पिछले साल दिनांक तीन जुलाई 2019 को शिकायतकर्ता एएन पांडेय के अतिरिक्त अंबिकापुर जिला न्यायालय के करीब आधे दर्जन अधिवक्ताओं ने बलरामपुर जाकर तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा को संयुक्त शिकायत पत्र के साथ आवश्यक सरकारी आदेश व अन्य दस्तावेज की काॅपी लगाकर उसके पालन की दिशा में कार्रवाई करने का आग्रह किया था.

उस पत्र में साफ तौर पर लिखा गया है कि धर्मदाय भूमि की देखरेख की संपूर्ण जिम्मेदारी जिला कलेक्टरों को स्पष्ट रूप से दी गयी है तथा भूमि का अवैध रूप से हेराफेरी करने वाले संबंधित लोगों के साथ-साथ संबंधित राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध भी आपराधिक प्रकरण दर्ज़ कराने का निर्देश सरकारी पत्र में है.

पर, कलेक्टर संजीव झा की ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज करने की आदत यहां भी बनी रही. इसके बाद भी कोई कार्रवाई होती नहीं दिखने पर शिकायतकर्ता ने कलेक्टर संजीव झा की शिकायत मंत्रालय से की पर, मंत्रालयों के आदेश, निर्देश, नियमों, कानून का मखौल उड़ाने वाले कलेक्टर को जब धार्मिंक न्यास एवं धर्मस्य विभाग द्वारा पत्र क्रमांक 404/2019 दिनांक 17.12.2019 का पत्र मिला तब भी इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ा.

क्या मुख्यमंत्री से लेकर अधिकारी तक बेबस हैं?

गंभीर तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री द्वारा सौंपी गई शिकायत को भी यदि पटवारी के झूठे प्रतिवेदन से खत्म कर दिया जाए तो समझा जा सकता है की प्रदेश में न्याय व शासन की क्या स्थिति है.

भ्रष्ट, निरंकुश अधिकारियों के सामने आम जनता की क्या स्थिति है इसे भी बेहतर समझा जा सकता है. शिकायतकर्ता ने प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रालय, राज्यपाल, एडवोकेट जनरल तक को शिकायत कर डाली पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

न्याय के लिए वे कब तक दर-दर भटकते रहेंगे उन्हें भी नहीं पता. वर्ष 2005 में सरगुजा के संभागीय उपायुक्त ने भी जांच में आरएसएस कार्यकर्ता को फ़र्जी बताया था.

संभागीय उपायुक्त एपी सांडिल्य ने भी अपनी जांच में यह लिखा था कि अनावेदक ललितेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव, आत्मज श्री सुमेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव, निवासी महुआ पारा, मूलतः उत्तर प्रदेश के निवासी हैं जो राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर जल संसाधन संभाग क्रमांक 1 के उप संभाग 2 में टाइम कीपर यानी समयपाल के पद पर फर्जी रूप से स्थायी शासकीय नौकरी प्राप्त कर लिए हैं.

वह अपना परिचय सरस्वती शिक्षा संस्थान के संभागीय सचिव के रूप में देता है. इंटरमीडिएट थर्ड डिवीजन पास को सरस्वती शिक्षा संस्थान के संभागीय सचिव तथा अरण्य जन कल्याण समिति का सचिव होना संदेहास्पद है, पर विडंबना देखिये की आज इन फ़र्जी संघी लोगों ने ही इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया और प्रशासन कार्रवाई करने के बजाये संरक्षण दे रहा है.

विधायक चिंतामणि ने कहा ज़्यादा जानकारी नहीं है – ‘पता करवाता हूँ’

संघियों द्वारा ज़मीन के फ़र्जीवाड़े पर जब हमने सामरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक चिंतामणि सिंह से बात कर जानकारी लेनी चाही तो उनका कहना था कि डीपाडीह धर्मदाय की जमीन को लेकर बहुत ज़्यादा जानकारी उन्हें नहीं है.

उन्हें सिर्फ यह पता है कि वहां चंद्रभूषण गिरी नाम के एक महात्मा रहते थे, अब अगर मठ या मंदिर की जमीन पर कोई कब्ज़ा हुआ है तो इस पर पूरी जानकारी के बाद ही कार्रवाई के संबंध में कुछ कह पाएंगे.

कलेक्टर संजीव झा ने पूरे मसले पर चुप्पी साध ली

आरएसएस कार्यकर्ताओं को नियम विरुद्ध तरीके से ज़मीन देने के मामले में जिस तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा पर आरोप लगे हैं वो फ़िलहाल छत्तीसगढ़ में सरगुजा जिले में कलेक्टर हैं. उनसे जब हमने इस आरोप पर संबंधित दस्तावेज भेजकर व्हाट्सएप पर प्रतिक्रिया चाही तो वे चुप्पी साधे रहे. उन्होंने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देना मुनासिब नहीं समझा.

( साभार : जनज्वार )

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