फेल हुए कलेक्टर . . !

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जनचर्चा.

शीर्षक देखकर चौंकिए मत . . . कलेक्टर सर ने कोई परीक्षा नहीं दी थी कि जिसमें फेल या पास होने की बात महत्वपूर्ण हो लेकिन यह भी किसी परीक्षा से कम नहीं है.

कोरोना महामारी . . . लाकडाउन जैसे विषय क्या किसी परीक्षा से कम है ? बिना पेपर वाली इस परीक्षा में हर कोई किसी भी स्तर पर पास होना ही चाहता है लेकिन जिलाधीश साहेब इसमें किंतु परंतु करते हुए फेल हो गए हैं.

वह तो संस्कारधानी के संस्कार ऐसे थे कि व्यापारियों ने अपनी दुकानें नहीं खोली नहीं तो कलेक्टर सर के सिर से पगडी़ ही उतर जाती.

जनचर्चा बताती है कि व्यापारियों ने विरोध की पूरी तैयारी कर रखी थी लेकिन उन्हें किसी से, कहीं से यह जानकारी मिली कि उन पर महामारी अधिनियम संबंधी कार्रवाई की जा सकती है तो वह पीछे हट गए.

इसके बावजूद उन्होंने इतनी हिम्मत तो दिखाई ही कि पहुंच गए कलेक्टर के फैसले पर विरोध जताने उनके कक्ष में. जनचर्चा वहां पर भी कलेक्टर को व्यापारियों के समक्ष किंतु परंतु करने वाला बताती है.

दरअसल, मामला बिगडा़ कैसे इस पर यदि जाया जाए तो कलेक्टोरेट का अतिउत्साह ही बतौर कारण उभर कर सामने आता है. पहले तो कोरोना के उभार पर एक बैठक होती है जिसके बाद शासकीय खबर आती है कि संस्कारधानी में लाकडाउन की जरुरत नहीं है.

जनचर्चा इस बात पर आश्चर्य जताती है कि इसके तुरंत बाद लाकडाउन किए जाने की खबर दी जाती है. त्योहार के समय पहले से परेशान चल रहे छोटे-बडे़ व्यापारी इससे उखड़ जाते हैं.

व्यापारियों की बैठक होती है जिसमें लाकडाउन में भी दुकानें खोले जाने के संबंध में भी चर्चा होती है.

चूंकि व्यापारियों में एक गुट की कमान विपक्षी दल से जुडे़ नेताओं के हाथों में है तो उन्हें यह बात जल्दी समझ आती है कि लाकडाउन का विरोध मतलब कोरोना से जुडी़, देशभर में सरकार द्वारा की गई व्यवस्था का विरोध होगा तो यह विरोध परवान नहीं चढ़ पाया.

व्यापारियों ने विरोध स्वरुप अपने प्रतिष्ठानों में पांपलेट पोष्टर लगाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी. वह तो अच्छा हुआ कि लाकडाउन का उन्होंने शाब्दिक विरोध किया लेकिन यदि विरोध दुकानें खोलकर किया जाता तो कलेक्टर की भद पिट जाती.

याद रखिए ऐसी ही परिस्थिति मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी में निर्मित हुई है. वहां प्रशासन ने कोरोना संक्रमण को देखते हुए शहर में लेफ्ट-राइट के अनुसार दुकानें खोलने का नियम बनाया है.

लेकिन, प्रशासन के इस नियम के खिलाफ व्यापारियों ने विद्रोह का शंखनाद कर दिया है. शहर के मध्यक्षेत्र के व्यापारियों ने कहा कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है. व्यापारियों ने कहा कि वे सोमवार से हर हाल में दुकानें खोलेंगे चाहे फांसी चढ़ा दो.

व्यापारियों ने कहा कि प्रशासन यदि हमें कुछ गाइडलाइन और समझाइश देकर बाजार खोलने की अनुमति देता है तो हम उसका पूरी तरह से पालन करेंगे.

अगर अनुमति नहीं देता है तो भी हम सोमवार से अपनी रोजी-रोटी पूरी तरह से खोलेंगे और इसके लिए जनप्रतिनिधियों को भी हमारा साथ देना होगा, क्योंकि हमने जनप्रतिनिधियों को वोट दिए हैं, कलेक्टर को नहीं.

मतलब साफ है . . . कलेक्टर चाहे यहां का हो या वहां का . . . हर जगह आम जनता कोरोना अथवा लाकडाउन के तौरतरीकों पर विरोध जता रही है. जनचर्चा कहती है कि :

लाकडाउन का विरोध, फिर भी प्रशासन को सहयोग ! ! !

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