पुलिस भर्ती : हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

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बिलासपुर .

राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा आरक्षक भर्ती को लेकर दिए गए एक आदेश ने याचिकाकर्ताओं को उच्चतम न्यायालय जाने पर विचार विमर्श करने मजबूर कर दिया है। जल्द ही इस पर एक राय बनाने बैठक की जा सकती है। सबकुछ यदि ठीक रहा तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य में आयोजित 2017 की पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा के निरस्त किए जाने के ख़िलाफ़ दायर करीब 25 याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस भर्ती को ख़ारिज किए जाने के राज्य सरकार आदेश को चुनौती दी थी।

कब क्या हुआ ?

राज्य सरकार ने 29 दिसबंर 2017 को आरक्षक के 2254 पदों के लिए 28 ज़िलों में विज्ञापन जारी किया था। इसमें 3 लाख 83 हजार 320 आवेदन आए थे।

शारीरिक परीक्षा 26 अप्रैल 2018 से 12 जून 2018 तक चली थी। इसमें राज्य के 61 हजार 511 अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए थे।

इसके बाद 31 सितंबर 2018 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी। लिखित परीक्षा में 48 हजार 761 अभ्यर्थी उत्तीर्ण घोषित किए गए थे।

आरक्षक भर्ती परीक्षा के मॉडल आंसर भी जारी हो चुके थे। अभ्यर्थियों का अब साक्षात्कार होना ही था कि तभी उन्हें बुरी खबर सुनाई दी।

नियुक्ति के अंतिम चरण की बाट जोह रहे अभ्यर्थियों के लिए पुलिस महानिदेशक द्वारा जारी किया गया वह पत्र झटका सा साबित हुआ जिसमें उन्होंने भर्ती प्रक्रिया को निरस्त कर दिए जाने का उल्लेख किया था।

27 सितंबर 2019 को जारी इस आदेश के ख़िलाफ़ 25 याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गईं थी। इस भर्ती प्रक्रिया को निरस्त करने के आदेश को चुनौती देते हुए कहा गया था –

“भर्ती प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में थी। मॉडल आंसर जारी हो चुके थे। ऐसे में यह कहना कि भर्ती प्रक्रिया में चूक हुई इसलिए भर्ती निरस्त की जाती है गलत है। इसके लिए अभ्यर्थी दोषी नहीं है।”

इसका जवाब राज्य सरकार द्वारा दिया गया। सरकार ने अपने जवाब में कहा कि

“राज्य की कोई भी प्रक्रिया विधिसम्मत ही चल सकती है। विधि विभाग ने सूचित किया था कि,विज्ञापन की कंडिका दस में जिस भर्ती प्रक्रिया का ज़िक्र है, वह तब नियम के रुप में लागू ही नहीं हुई थी इसलिए यह भर्ती विधि विरुद्ध है। ”

राज्य की ओर से दलील दी गई कि इस भर्ती प्रक्रिया में जो शारीरिक दक्षता के मानक बताए गए थे, वे नियम के रुप लागू ही नहीं किए गए थे लेकिन भर्ती प्रक्रिया में इसे शामिल किया गया।

जबकि भर्ती का विज्ञापन छप गया उसके बाद नियम बनाया गया । इसलिए यह भर्ती गलत थी, यदि इसे स्वीकार किया जाता तो गलत और विधिविरुद्ध दृष्टांत स्थापित होता।

बहरहाल , जस्टिस गौतम भादुड़ी ने राज्य की ओर से प्रस्तुत तर्क को मान्य करते हुए सभी याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया है । अब याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट जाने का विचार कर रहे हैं।

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