क्या आप जेएनयू के गरीब बच्चों के साथ हैं ?

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संजय पराते – नज़रिया

जेएनयू के छात्र केवल अपने लिए नहीं, हमारे-आपके बच्चों के भविष्य के लिए भी लड़ रहे हैं, जिसे संघ संचालित मोदी सरकार नई शिक्षा नीति के जरिये बर्बाद कर देना चाहती है।

इस नीति का लब्बो-लुबाब यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार अब कोई निवेश नहीं करेगी और पढ़ने-लिखने/पढ़ाने-लिखाने का पूरा खर्च बच्चों और उनके मां-बापों को ही उठाना पड़ेगा।

शिक्षा के निजीकरण की जिन नीतियों पर यह सरकार चल रही है, यह उसका क्रूरतम पूंजीवादी विस्तार ही है, जिसके लागू हो जाने के बाद मध्यमवर्गीय कर्मचारियों के बच्चे भी उचित ढंग से शिक्षा प्राप्त करने से वंचित हो जाएंगे।

मोदी सरकार एक ऐसी शिक्षा प्रणाली को लागू करना चाहती है, जो अपने चरित्र में ही एक बेहतर इंसान गढ़ने के शिक्षा के बुनियादी उद्देश्य के खिलाफ है।

वे ऐसे रोबोट तैयार करना चाहते हैं, जो समग्र रूप से धनी वर्ग के मुनाफों को पैदा करने में सहायक हो और विशेष रूप से आर्य सवर्णों की सेवा का साधन बनें ।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्हें सोचने-समझने, चिंतन-मनन करने वाले नागरिकों की जरूरत नहीं है। इसलिए वे शिक्षा का सार्वभौमिकीकरण नहीं, संकुचीकरण करना चाहते हैं।

यह एक खतरनाक मनुवादी प्रोजेक्ट है, जो मानव सभ्यता द्वारा अर्जित हजारों सालों की बेहतरीन उपलब्धियों को मटियामेट करना चाहती है।

वे सब कुछ खत्म करना चाहते हैं, जो उनके हिंदुत्ववादी परियोजना के विस्तार के आड़े आ सकता है। इसके लिए वे संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और हमारे संघीय ढांचे की तमाम संस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट करना चाहते हैं।

इस बर्बादी की शुरूआत वे जेएनयू से करना चाहते हैं। वे सब कुछ खत्म करना चाहते हैं, जबकि जेएनयू सब कुछ बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

जेएनयू लड़ रहा है कि हर बच्चे को अच्छी और सस्ती शिक्षा का अधिकार मिले। जेएनयू में जो बच्चे पढ़ रहे हैं, 30 फीसद बच्चों के परिवारों की वार्षिक आय 30000 रुपयों से कम है। 70 फीसद बच्चों के परिवारों की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम है।

गरीब परिवारों के ये बच्चे पैसों की कृपा या राजनैतिक नेताओं की सिफारिशों या जोड़-तोड़ से नहीं आते, बल्कि अपनी प्रतिभा के दम पर जेएनयू में प्रवेश करते हैं और देश का नाम रोशन करते हैं।

इस जेएनयू ने जितने नायक हमारे देश को दिए हैं, उतने शायद ही किसी विश्वविद्यालय ने पैदा किए हों। इसीलिए जेएनयू दुनिया के टॉप विश्वविद्यालयों में से एक है।

यह सर्वोच्चता इसलिए भी है कि इसके परिसर के जनतांत्रिक वातावरण को, जिसे यहां के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों — सबने मिलकर बनाया है, आज तक बनाये रखा जा सका है।

इस देश की प्रगतिशील-जनवादी ताकतें इस देश को जो कुछ दे सकती हैं, उसका बेहतरीन प्रतिबिम्ब जेएनयू में दिखाई देता है।

इसी बेहतरीन को बदतरीन में बदलने में जुटी है मोदी सरकार। इस पोस्ट के साथ जेएनयू के फीस-ढांचे में हुई वृद्धि की तस्वीरों को देखें :

● स्थापना शुल्क में वृद्धि दुगुना

● मेस सुरक्षा निधि में वृद्धि डेढ़ गुना से ज्यादा

● बर्तनों के उपयोग पर शुल्क वृद्धि चार गुना

● अखबारों के लिये शुल्क वृद्धि तिगुना से ज्यादा

● गेस्ट कूपन चार्ज में वृद्धि ढाई गुना

● गेस्ट चार्ज में वृद्धि तीन गुना

● गेस्ट के भोजन शुल्क में वृद्धि लगभग डेढ़ गुना

● मेस के लिए विलंब शुल्क में वृद्धि बीस गुना !!

● मेस में पुनर्प्रवेश शुल्क में वृद्धि पांच गुना

● एक्स्ट्रा अंडा / दूध / हलवा / उपमा / दलिया / ब्रेड पीस मांगने पर हर आइटम पर शुल्क वृद्धि दुगुना

● एक्स्ट्रा फल / केला लेने पर दरों में वृद्धि लगभग डेढ़ गुना

● एसी उपयोग करते पाए जाने पर जुर्माना : प्रति एसी 10000 रुपये

● फ्रीज या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करते पाए जाने पर जुर्माना : प्रति उपकरण 3000 रुपये

● पुरुष हॉस्टलों में महिला गेस्ट पाए जाने पर : प्रति गेस्ट 3000 रुपये

● अनाधिकृत व्यक्ति के रुकने पर : प्रति व्यक्ति 5000 रुपये

● जेएनयू के अन्य हॉस्टलों के किसी छात्र का किसी और हॉस्टल के रूम में रुके पाए जाने पर : प्रति छात्र 1000 रुपये !!!

छात्रों को शिक्षा मुफ्त मिलनी चाहिए। यह खैरात नहीं, देश के विकास के लिए निवेश है। देश की सत्ताधारी पार्टियां इसके लिए तैयार नहीं है। लेकिन सस्ती शिक्षा तो दी ही जा सकती है। वह हमारे बच्चों को इससे भी महरूम करने पर तुला हुआ है।

सोचिए, देश में सबसे सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराने वाले विश्वविद्यालय में विभिन्न मदों में अदा की जाने वाली फीस यदि डेढ़ से बीस गुना तक बढ़ जाएगी, तो इस विश्वविद्यालय में हमारे बच्चे कैसे पढ़ेंगे ?

इससे भी बड़ी बात यह कि जिन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आज जेएनयू से कई गुना ज्यादा फीस देकर हमारे बच्चे जैसे-तैसे पढ़ रहे हैं, वहां की फीस भी यदि इसी अनुपात में डेढ़ से बीस गुना बढ़ा दी जाएगी, तो हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ी का क्या होगा??

क्या जवाब देंगे हम, जब हमारे बच्चे पूछेंगे : *जब जेएनयू हमारे लिए लड़ रहा था, तब आप क्या कर रहे थे!! अब तय आपको करना है कि

क्या आप जेएनयू के गरीब बच्चों के साथ है?

यदि हां, तो सड़कों पर उतरिये, जोर से नारे लगाकर अपनी मूक जबान को वाणी दें !

यदि नहीं, तो अपने बच्चों के भविष्य की कब्र खोदना शुरू कर दें !!

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