एक टिकट जिससे उजागर हुई भाई-बहन की खटास

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नेशन अलर्ट/रायपुर-दुर्ग।

वैशाली नगर… युद्ध का मैदान…युद्ध लेकिन परायों से नहीं बल्कि अपनों से.. ठीक उसी तरह जिस तरह महाभारत में कौरव-पांडव की सेना एक दूसरे के खून की प्यासी थी उसी तरह यहां संबंध नहीं बल्कि ताकत की जोर-आजमाईश चल रही है। दुर्ग का ताकतवर पांडे परिवार इन दिनों इस हद तक अपने में उलझा हुआ है कि उसके घर के अंदर-बाहर की चीजें लोगों की जुबान पर आ गई हैं।

सुश्री सरोज पांडे कभी दुर्ग नगर निगम की महापौर हुआ करतीं थीं। इसी दौरान उन्हें पार्टी ने वैशाली नगर से विधायक बनने का अवसर दिया और वह जीतीं भी। तब अचानक लोकसभा चुनाव में सुश्री पांडे को टिकट मिली और उन्होंने जीत हासिल कर एक नया इतिहास रच दिया। लेकिन इसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि सरोज पांडे लोगों के बीच दीदी संबोधन से पुकारे जाने के बावजूद अपनी जीत का आशीर्वाद अपने ‘भाईयोंÓ से नहीं ले पाईं।

सरोज पांडे 2014 का लोकसभा चुनाव बड़ी ही विपरित परिस्थितियों में लड़कर हार गई। पूरे देश में चली मोदी लहर के बावजूद सरोज पांडे को न लहर काम आई और न ही उनका खुद का रौबदार व्यक्तित्व। इसके बावजूद सरोज दीदी संगठन की राजनीति करती रहीं। उन्हें भाजपा में महासचिव का दर्जा देकर महाराष्ट्र जैसे उर्वरक राज्य का प्रभारी बनाया गया। और तो और राज्यसभा सदस्य की टिकट तब मिली जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक उस दौड़ में आगे थे।

…लेकिन सबकुछ उजागर हुआ
कहते हैं, जीवन का हिस्सा है धूप-छांव। इस बार के चुनाव में यह छांव पांडे परिवार को घेर के रखे हुए है। सरोज पांडे की व्याकुलता इस बात से समझी जा सकती है कि उनके समर्थकों को एक तो टिकट नहीं मिली और दूसरी ओर उनके घर में भी राजनीतिक लड़ाई छिड़ गई है।

मसला वही है वैशाली नगर से कौन होगा विधायक? भाजपा की सूची में जब वैशाली नगर सीट से विद्यारतन भसीन का नाम सामने आया तब सरोज के भाई साहब राकेश पांडे के सब्र का बांध टूट गया। उन्होंने न केवल धैर्य खोया बल्कि भाजपा की उस नस को दबा दिया जो कमजोर मानी जाती थी।

राकेश पांडे मुख्यमंत्री सहित पूर्व सांसद बलीराम कश्यप, दिलीप सिंह जुदेव सहित कई अन्य पर बरसे थे। और तो और उन्होंने भाजपा से बगावत का ऐलान करते हुए स्वयं के निर्दलीय लडऩे की घोषणा कर दी थी। इस समय तक सरोज पांडे शांत बैठीं हुई थीं और वह परिदृश्य में कहीं नजर नहीं आ रहीं थीं।

बहन के साथ पहुंचे थे राकेश
लेकिन, गुरुवार दोपहर का नजारा कुछ और था। अपनी बहन व भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडे के साथ राकेश पांडे अचानक भाजपा कार्यालय एकात्म परिसर पहुंचे थे। वहां उनकी मुलाकात राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह, प्रदेश प्रभारी अनिल जैन, प्रदेश संगठन मंत्री पवन साय से हुई। इस दौरान उनकी बहन सुश्री सरोज पांडे भी मौजूद थीं।

मुलाकात के संदर्भ में वह बताते हैं कि वह अपने मन की बात रखना चाहते थे। दल के भीतर की बात है। नाराजगी का कोई विषय नहीं है। प्रत्याशी चयन करने की प्रक्रिया के तहत ही मेरा नाम आया था। पार्टी ने सर्वे से जानकारी जुटाई थी उससे यह उजागर हुआ था कि कार्यकर्ता मुझे प्रतिनिधि के रुप में देखना चाहते हैं। मुझे दु:ख इस बात का है कि जब हम पार्टी विथ डिफरेंस के हिसाब से चलते हैं तो यह परंपरा हर हाल में कायम रहनी चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि आपने आला नेताओं से मुलाकात की तो इसका जवाब क्या आया? तो उन्होंने कहा कि, ये प्रश्र अब भी कायम है। जवाब आने तक कायम है।

संकट अभी टला नहीं है
इसके बावजूद संकट है कि वह टलने का नाम नहीं ले रहा है। बताया जाता है कि राकेश की पत्नी श्रीमती चारुलता पांडे अभी भी बागी सुर अख्तियार किए हुए हैं। हालांकि उन्होंने पहले ही वैशाली नगर के साथ भिलाई नगर से निर्दलीय नाम निर्देशन पत्र ले लिया था।

चूंकि आज अपने भाई राकेश को लेकर सुश्री सरोज पांडे ने वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर मामले को शांत करने का प्रयास किया है लेकिन उनकी भाभी श्रीमती चारुलता पांडे निर्दलीय लडऩे पर आमादा हैं। यदि यह होता है तो न केवल भाजपा को नुकसान होगा बल्कि एक परिवार अपनी राजनीतिक लड़ाई को लेकर लोगों के बीच उजागर भी हो जाएगा।

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